हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.1.23

कांड 12 → सूक्त 1 → मंत्र 23 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्ते॑ ग॒न्धः पृ॑थिवि संब॒भूव॒ यं बिभ्र॒त्योष॑धयो॒ यमापः॑ । यं ग॑न्ध॒र्वा अ॑प्स॒रस॑श्च भेजि॒रे तेन॑ मा सुर॒भिं कृ॑णु॒ मा नो॑ द्विक्षत॒ कश्च॒न ॥ (२३)
हे पृथ्वी! तेरी जिस गंध को ओषधियां और जल धारण करते हैं, जिस का सेवन गंधर्व और अप्सराएं करती हैं, तू मुझे उसी गंध से सुशोभित बना. कोई मेरा वैरी न रहे. (२३)
O earth! The smell that the medicines and water wear, which gandharvas and apsaras consume, you adorned me with the same smell. No one is my enemy. (23)