हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.1.25

कांड 12 → सूक्त 1 → मंत्र 25 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यस्ते॑ ग॒न्धः पुरु॑षेषु स्त्री॒षु पुं॒सु भगो॒ रुचिः॑ । यो अश्वे॑षु वी॒रेषु॒ यो मृ॒गेषू॒त ह॒स्तिषु॑ । क॒न्यायां॒ वर्चो॒ यद्भू॑मे॒ तेना॒स्माँ अपि॒ सं सृ॑ज॒ मा नो॑ द्विक्षत॒ कश्च॒न ॥ (२५)
हे पृथ्वी! तुम्हारी जो गंध स्त्रीपुरुषों में, घोड़ों में, वीरों में, मृग में, हाथी में तथा कन्या में है, मुझे उन सब की गंध से संपन्न बना. मुझ से द्वेष करने वाला कोई न रहे. (२५)
O earth! The smell of yours in men, horses, heroes, antelopes, elephants and girls, made me endowed with the smell of all of them. There should be no one to hate me. (25)