हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.1.35

कांड 12 → सूक्त 1 → मंत्र 35 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यत्ते॑ भूमे वि॒खना॑मि क्षि॒प्रं तदपि॑ रोहतु । मा ते॒ मर्म॑ विमृग्वरि॒ मा ते॒ हृद॑यमर्पिपम् ॥ (३५)
हे पृथ्वी! मैं तेरे जिस स्थल को खोदूं वह शीघ्र ही पहले जैसा हो जाए. मैं तेरे मर्म को पूर्ण करने में समर्थ नहीं हूं. (३५)
O Earth! The place I dig for you will soon become the same as before. I am not able to fulfill your heart. (35)