हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.1.37

कांड 12 → सूक्त 1 → मंत्र 37 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
याप॑ स॒र्पं वि॒जमा॑ना वि॒मृग्व॑री॒ यस्या॒मास॑न्न॒ग्नयो॒ ये अ॒प्स्वन्तः । परा॒ दस्यू॒न्दद॑ती देवपी॒यूनिन्द्रं॑ वृणा॒ना पृ॑थि॒वी न वृ॒त्रम् । श॒क्राय॑ दध्रे वृष॒भाय॒ वृष्णे॑ ॥ (३७)
जो पृथ्वी सूर्य के हिलने पर कांपती है, विद्युत के रूप में जल में रहने वाली अग्नि जिस पृथ्वी में भी निवास करती है, जिस ने वृत्रासुर को त्याग कर इंद्र का वरण किया था, जो देव हिंसकों के लिए फल देने वाली नहीं होती तथा जो पुष्ट और शक्तिशाली पुरुष के अधीन रहती है. (३७)
The earth that trembles when the sun moves, the agni that lives in the water in the form of electricity, also resides in the earth, which abandoned Vritrasura and chose Indra, which is not going to give fruit to the gods and violent and who lives under a strong and powerful man. (37)