हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.3.38

कांड 12 → सूक्त 3 → मंत्र 38 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
उपा॑स्तरी॒रक॑रो लो॒कमे॒तमु॒रुः प्र॑थता॒मस॑मः स्व॒र्गः । तस्मि॑ञ्छ्रयातै महि॒षः सु॑प॒र्णो दे॒वा ए॑नं दे॒वता॑भ्यः॒ प्र य॑च्छान् ॥ (३८)
हे यजमान! ओदन परोस कर तुम ने इस लोक को वश में कर लिया है. उस के प्रभाव से स्वर्ग के यही ओदन तुझे अधिक बढ़े हुए प्राप्त हों. हे पति और पत्नी! यह सुंदर महिमा वाला और गमनशील ओदन तुम्हे स्वर्ग को प्राप्त कराए. देवता इस यजमान को देवों के समीप पहुंचा दें. (३८)
O host! By serving odan, you have subdued this world. May you get these odans of heaven more than his influence. O husband and wife! May this beautifully glorified and ly moving odan bring you to heaven. May the gods bring this host closer to the gods. (38)