हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.3.48

कांड 12 → सूक्त 3 → मंत्र 48 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
न किल्बि॑ष॒मत्र॒ नाधा॒रो अस्ति॒ न यन्मि॒त्रैः स॒मम॑मान॒ एति॑ । अनू॑नं॒ पात्रं॒ निहि॑तं न ए॒तत्प॒क्तारं॑ प॒क्वः पुन॒रा वि॑शाति ॥ (४८)
इस कर्म में किसी प्रकार का हेरफेर नहीं है. इस का कोई अन्य आधार भी नहीं है. यह अपने मित्रों के साथ मिल कर भी नहीं आता है. यह जो पूर्ण पात्र रखा गया है, वही पकाने वाले को पुनः प्राप्त हो जाता है. (४८)
There is no manipulation in this karma. There is no other basis for this. It doesn't even come together with your friends. The full vessel that is placed is retrieved by the cook. (48)