हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.4.28

कांड 12 → सूक्त 4 → मंत्र 28 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
यो अ॑स्या॒ ऋच॑ उप॒श्रुत्याथ॒ गोष्वची॑चरत् । आयु॑श्च॒ तस्य॒ भूतिं॑ च दे॒वा वृ॑श्चन्ति हीडि॒ताः ॥ (२८)
जो संकल्प रूप वाणी के पश्चात भी अपनी गायों में विचरण करता है, वह देवताओं का अपमान करता है और देवताओं द्वारा ही अपनी आयु और ऐश्वर्य को नष्ट करने वाला होता है. (२८)
One who roams in his cows even after the resolution form of speech, he insults the gods and is the one who destroys his life and opulence by the gods. (28)