हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 12.4.39

कांड 12 → सूक्त 4 → मंत्र 39 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 12)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
म॒हदे॒षाव॑ तपति॒ चर॑न्ती॒ गोषु॒ गौरपि॑ । अथो॑ ह॒ गोप॑तये व॒शाद॑दुषे वि॒षं दु॑हे ॥ (३९)
जो गर्भघातिनी वशा को अपनी मानता है या उस का पाचन करता है, बृहस्पति उस के पुत्र, पौत्र आदि को लेने की इच्छा करते हैं. (३९)
Whoever considers the pregnant vasha as his own or digests it, Jupiter wishes to take his son, grandson etc. (39)