हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 13.1.12

कांड 13 → सूक्त 1 → मंत्र 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
स॒हस्र॑शृङ्गो वृष॒भो जा॒तवे॑दा घृ॒ताहु॑तः॒ सोम॑पृष्ठः सु॒वीरः॑ । मा मा॑ हासीन्नाथि॒तो नेत्त्वा॒ जहा॑नि गोपो॒षं च॑ मे वीरपो॒षं च॑ धेहि ॥ (१२)
सहस्रो सींगों वाले, घृत के द्वारा बुलाए गए, इष्टों की पूर्ति करने वाले, सोम, पृष्ठ, सुवीर तथा जातवेद अग्नि मेरा त्याग न करें. वे अग्नि मुझे गायों तथा पुत्र, पौत्र आदि की पुष्टि में प्रतिष्ठित करें. (१२)
Do not abandon me with sahasro horns, called by ghrit, those who fulfill the favored, Soma, Phara, Suveer and Jataveda agni. May those agnis establish me in the affirmation of cows and sons, grandsons etc. (12)