अथर्ववेद (कांड 13)
वेदिं॒ भूमिं॑ कल्पयि॒त्वा दिवं॑ कृ॒त्वा दक्षि॑णाम् । घ्रं॒सं तद॒ग्निं कृ॒त्वा च॒कार॒ विश्व॑मात्म॒न्वद्व॒र्षेणाज्ये॑न॒ रोहि॑तः ॥ (५२)
रोहित ने पृथ्वी को वेदी बना कर, आकाश को दक्षिणा का रूप दे कर और दिन को अग्नि स्वीकार कर के वर्षा रूपी घृत से जगत् को आत्मा के समान बना लिया है. (५२)
Rohita has made the world like a soul by making the earth an altar, giving the sky the form of dakshina and accepting the day as agni. (52)