हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 13.1.56

कांड 13 → सूक्त 1 → मंत्र 56 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 13)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यश्च॒ गां प॒दा स्फु॒रति॑ प्र॒त्यङ्सूर्यं॑ च॒ मेह॑ति । तस्य॑ वृश्चामि ते॒ मूलं॒ न च्छा॒यां क॑र॒वोऽप॑रम् ॥ (५६)
जो सूर्य की ओर मुंह कर के मूत्र का त्याग करता है तथा गौ को अपने पैर से छूता है, मैं उस का मूल छिन्न करता हूं. मैं उस के ऊपर कभी छाया नहीं करता. (५६)
Whoever gives up urine facing the sun and touches the cow with his feet, I pierce the root of it. I never shadow over that. (56)