अथर्ववेद (कांड 13)
त्वम॑ग्ने॒ क्रतु॑भिः के॒तुभि॑र्हि॒तो॒र्कः समि॑द्ध॒ उद॑रोचथा दि॒वि । किम॒भ्यार्चन्म॒रुतः॒ पृश्नि॑मातरो॒ यद्रोहि॑त॒मज॑नयन्त दे॒वाः । तस्य॑ दे॒वस्य॑ क्रु॒द्धस्यै॒तदागो॒ य ए॒वं वि॒द्वांसं॑ ब्राह्म॒णं जि॒नाति॑ । उद्वे॑पय रोहित॒ प्र क्षि॑णीहि ब्रह्म॒ज्यस्य॒ प्रति॑ मुञ्च॒ पाशा॑न् ॥ (२३)
हे अग्नि! तुम ऋतु संबंधी दशों में प्रदीप्त किए जाते हो तथा स्वर्ग में अर्चना के साधन रूप बनते हो. क्या पश्निमाताओं के पुत्र मरुद्गण ने तुम्हारी पूजा की थी जो देवता रोहित देव से मिले थे. उन क्रोधवंत देव के अपराधी तथा विद्वान् ब्राह्मण के हिंसक को हे रोहित देव! तुम कंपित करते हुए क्षीण बनाओ और अपने पाशों से बांध लो. (२३)
O agni! You are illuminated in the seasonal tens and become a means of worship in heaven. Did Marudgan, the son of the Pashnimatas, worship you who met the deity Rohit Dev? O Rohit Dev, the criminal of those angry gods and the violent of the learned Brahmin! Make you staggered attenuated and tie to your loops. (23)