हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
Home » Atharvaved » Kand 13 » Sukta 9 अथर्ववेद (कांड 13) उ॒रुः पृ॒थुः सु॒भूर्भुव॒ इति॒ त्वोपा॑स्महे व॒यम् ॥ (१)
तुम हमें अन्न, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस प्रदान करो. तुम्हारी हम उपासना करते है. (१)
May you give us food, fame, glory and brahmavarchas. We worship you. (1)
अथर्ववेद (कांड 13) प्रथो॒ वरो॒ व्यचो॑ लो॒क इति॒ त्वोपा॑स्महे व॒यम् ॥ (२)
आप महान, विस्तृत, उत्तम होने वाले एवं सामर्थ्य रूप हैं. हे शोभन! आप को नमस्ते, हे दर्शनीय! आप मुझे देखें, आप हमें अन्न, यश तेज तथा ब्रह्मवर्चस प्रदान करें. हम आप की उपासना करते हैं. (२)
You are great, detailed, good and powerful. O Shobhan! Hello to you, O visible! You see me, you give us food, fame and brahmavarchas. We worship you. (2)
अथर्ववेद (कांड 13) भव॑द्वसुरि॒दद्व॑सुः सं॒यद्व॑सुरा॒यद्व॑सु॒रिति॒ त्वोपा॑स्महे व॒यम् ॥ (३)
हम तुम्हें भागमुक्त, संबंधों को एकत्र करने वाले, संबंधों को प्राप्त करने वाले मान कर चुम्हारी उपासना करते हैं. (३)
We worship you as part-free, the gatherer of relationships, the recipient of relationships. (3)
अथर्ववेद (कांड 13) नम॑स्ते अस्तु पश्यत॒ पश्य॑ मा पश्यत ॥ (४)
हे दर्शनीय! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम मुझे देखो. (४)
O visible! Hello to you. You look at me. (4)
अथर्ववेद (कांड 13) अ॒न्नाद्ये॑न॒ यश॑सा॒ तेज॑सा ब्राह्मणवर्च॒सेन॑ ॥ (५)
तुम मुझे खानपान, यश, तेज और ब्रह्मवर्चस से युक्त करो. (५)
You equip me with food, fame, glory and brahmavarchas. (5)