हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
स॒त्येनोत्त॑भिता॒ भूमिः॒ सूर्ये॒णोत्त॑भिता॒ द्यौः।ऋ॒तेना॑दि॒त्यास्ति॑ष्ठन्ति दि॒वि सोमो॒ अधि॑ श्रि॒तः ॥ (१)
सत्य से भूमि और सूर्य से आकाश स्थित है. सूर्य के बिना आकाश में चंद्रमा स्थित नहीं होता. (१)
Truth is situated by land and sun by sky. Without the sun, the moon is not located in the sky. (1)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
सोमे॑नादि॒त्याब॒लिनः॒ सोमे॑न पृथि॒वी म॒ही । अथो॒ नक्ष॑त्राणामे॒षामु॒पस्थे॒ सोम॒ आहि॑तः ॥ (२)
सोम के कारण आदित्य बलशाली है तथा सोम के कारण पृथ्वी विशाल है. इसी कारण यह सोम नक्षत्रों के समीप रहता है. (२)
Aditya is strong because of Som and Earth is huge because of Som. For this reason, it lives near Som Nakshatras. (2)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
सोमं॑ मन्यतेपपि॒वान्यत्सं॑पिं॒षन्त्योष॑धिम् । सोमं॒ यं ब्र॒ह्माणो॑ वि॒दुर्न तस्या॑श्नाति॒पार्थि॑वः ॥ (३)
जो सोम रूप ओषधि को पीस कर पीते हैं, वे अग्नि को सोमपान करने वाला समझते हैं. ज्ञानी जन जिस सोम को जानते हैं, उस का भक्षण साधारण प्राणी नहीं कर सकते. (३)
Those who grind and drink the soma form medicine, they consider agni to be the one who drinks soma. Ordinary beings cannot eat the som that the knowledgeable people know. (3)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
यत्त्वा॑ सोमप्र॒पिब॑न्ति॒ तत॒ आ प्या॑यसे॒ पुनः॑ । वा॒युः सोम॑स्य रक्षि॒ता समा॑नां॒ मास॒आकृ॑तिः ॥ (४)
हे सोम! पुरुष तुम्हें पीते हैं, फिर भी तुम वृद्धि को प्राप्त होते रहते हो. अनेक संवत्सरों रूप से वायु इस सोम की रक्षा करता है. (४)
O Mon! Men drink you, yet you continue to grow. Air protects this Som in many Samvatsars. (4)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
आ॒च्छद्वि॑धानैर्गुपि॒तो बार्ह॑तैः सोमः रक्षि॒तः । ग्राव्णा॒मिच्छृ॒ण्वन्ति॑ष्ठसि॒न ते॑ अश्नाति॒ पार्थि॑वः ॥ (५)
हे सोम! बृहती छंदों वाले कर्मो से तथा आच्छद विधानों से तुम्हारी रक्षा होती है. सोम कूटने के पाषाण से जो शब्द होता है, उस से तुम्हारी स्थिति है. पार्थिव जीव तुम्हारा सेवन नहीं कर सके. (५)
O Mon! You are protected from the deeds of great verses and from the laws of the shadow. You have a position with the word that comes from the stone of soma kootne. The terrestrial creatures could not consume you. (5)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
चित्ति॑राउप॒बर्ह॑णं॒ चक्षु॑रा अ॒भ्यञ्ज॑नम् । द्यौर्भूमिः॒ कोश॒ आसी॒द्यदया॑त्सू॒र्यापति॑म् ॥ (६)
जब सूर्या अपने पति के पास गई, तब ज्ञान उस का तकिया तथा चक्षु ही अंजन बने. आकाश और पृथ्वी उस के कोष थे. (६)
When Surya went to her husband, knowledge became Anjan, her pillow and eyes became Anjan. The sky and the earth were his treasures. (6)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
रैभ्या॑सीदनु॒देयी॑ नाराशं॒सी न्योच॑नी।सू॒र्याया॑ भ॒द्रमिद्वासो॒ गाथ॑यति॒परि॑ष्कृता ॥ (७)
वेदमंत्रों के साथ उस की पिता के घर से विदाई हुई. मंत्रों से ही पति गृह में उस का स्वागत हुआ. मंत्रों के द्वारा पवित्र बना पति के घर का वस्त्र उस वधू का कल्याण करता है. (७)
He was farewell from his father's house with Vedamantras. She was welcomed in the husband's house only with mantras. The cloth of the husband's house made pure by mantras welfares the bride. (7)

अथर्ववेद (कांड 14)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
स्तोमा॑आसन्प्रति॒धयः॑ कु॒रीरं॒ छन्द॑ ओप॒शः । सू॒र्याया॑ अ॒श्विना॑व॒राग्निरा॑सीत्पुरोग॒वः ॥ (८)
पति के घर के यज्ञ वधू के लिए भोग तथा वेदमंत्र ही उस के आभूषण हुए थे. कुरीर नाम का छंद उस के शरीर का आभूषण बना. दोनों अश्विनीकुमार सूर्य के घर में और अग्नि देव उस के आगे चल रहे थे. (८)
Bhog and Vedamantra were her ornaments for the sacrificial bride of her husband's house. The verse named Kurir became the ornament of his body. Both Ashwinikumar was walking in Surya's house and Agni Dev was walking in front of him. (8)
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