अथर्ववेद (कांड 14)
मा हिं॑सिष्टंकुमा॒र्यं स्थूणे॑ दे॒वकृ॑ते प॒थि । शाला॑या दे॒व्या द्वारं॑ स्यो॒नं कृ॑ण्मोवधूप॒थम् ॥ (६३)
हे देव! इस वधू को वहन करने वाले रथ को हानि मत पहुंचाओ. हम इस वधू के मार्ग को शाला के द्वार पर कल्याणमय बनाते हैं. (६३)
O God! Don't harm the chariot carrying this bride. We make this bride's path welfare at the door of the school. (63)