अथर्ववेद (कांड 15)
स्व॒यमे॑नमभ्यु॒देत्य॑ ब्रूया॒द्व्रात्य॒ क्वावात्सी॒र्व्रात्यो॑द॒कं व्रात्य॑त॒र्पय॑न्तु॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते प्रि॒यं तथा॑स्तु॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते॒वश॒स्तथा॑स्तु॒ व्रात्य॒ यथा॑ ते निका॒मस्तथा॒स्त्विति॑ ॥ (२)
इस प्रकार का विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस घर में अतिथि हो, उसे स्वयं आसन दे कर कहे —हे व्रात्य! तुम कहां निवास करते हो? यह जल है. हमारे घर के व्यक्ति तुम्हें संतुष्ट करें. तुम्हें जो प्रिय हो, जेसा तुम्हारा वश हो और जैसा तुम्हारा काम हो उसी प्रकार का रहे. (२)
This kind of special knowledgeable Vratya, in the house where the guest is a guest, give him a seat and say - O Vratya! Where do you live? It's water. Let the person of our house satisfy you. Whatever you love, as you control and as your work is, it should be the same. (2)