अथर्ववेद (कांड 15)
य॑ज्ञाय॒ज्ञिय॑स्य च॒ वै स वा॑मदे॒व्यस्य॑ च य॒ज्ञस्य॑ च॒ यज॑मानस्य च पशू॒नांच॑ प्रि॒यं धाम॑ भवति॒ तस्य॒ दक्षि॑णायां दिशि ॥ (१२)
जो उस का सत्कार करता है, वह यज्ञाज्ञिय, वामदेव्य, यज्ञ, यजमान और पशुओं का प्रिय होता है. उस का स्थान दक्षिण दिशा में होता है. (१२)
He who honors him is dear to yajnagya, vamdevya, yajna, host and animals. His location is in south direction. (12)