हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 15.5.13

कांड 15 → सूक्त 5 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 15)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
म॑हादे॒वए॑नमिष्वा॒स ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः । नास्य॑ प॒शून्न स॑मा॒नान्हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (१३)
देवताओं ने ऊपर की दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले महादेव को तेरा अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. जो इस बात को जानता है, महादेव ऊपर की दिशा के कोने से उस की रक्षा करते हैं. जो पुरुष और पशु इस के अनुकूल होते हैं, उन की महादेव हिंसा नहीं करते हैं. (१३)
The gods appointed Mahadev, who wore a bow from the top corner, as the one who performed your rituals. Whoever knows this, Mahadev protects him from the corner of the upward direction. Mahadev does not do violence to men and animals who adapt to it. (13)