अथर्ववेद (कांड 17)
त्वं तृ॒तं त्वंपर्ये॒ष्युत्सं॑ स॒हस्र॑धारं वि॒दथं॑ स्व॒र्विदं॒ तवेद्वि॑ष्णो बहु॒धावी॒र्याणि । त्वं नः॑ पृणीहि प॒शुभि॑र्वि॒श्वरू॑पैः सु॒धायां॑ मा धेहि पर॒मेव्योमन् ॥ (१५)
हे इंद्र! तुम विस्तृत अंतरिक्ष को व्याप्त करते हो. तुम अनेक धाराओं वाले जल को व्याप्त करते हो. तुम ज्ञान के साधन यज्ञ पर अधिकार करते हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (१५)
O Indra! You cover a wide space. You pervade water with many streams. You possess yajna, the means of knowledge. O Great Indra! Your semen means there are many types of powers. You fill us with animals of many forms like cow, horse, etc. and establish us in Sudha located in Param Vyom. (15)