हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.1.14

कांड 18 → सूक्त 1 → मंत्र 14 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
न वा उ॑ ते त॒नूंत॒न्वा॒ सं पि॑पृच्यां पा॒पमा॑हु॒र्यः स्वसा॑रं नि॒गच्छा॑त् । असं॑यदे॒तन्मन॑सोहृ॒दो मे॒ भ्राता॒ स्वसुः॒ शय॑ने॒ यच्छयी॑य ॥ (१४)
यम-हे यमी! मैं तेरे शरीर का स्पर्श नहीं कर सकता. धर्म के जानने वाले भाई और बहन के ऐसे संबंध को पाप कहते हैं. यदि मैं ऐसा करूं तो यह कर्म मेरे हृदय, मन और प्राण का नाश कर देगा. (१४)
Yama- O Yummy! I can't touch your body. Such a relationship between brother and sister who knows dharma is called sin. If I do this, this action will destroy my heart, mind and soul. (14)