अथर्ववेद (कांड 18)
यद॑ग्न ए॒षासमि॑ति॒र्भवा॑ति दे॒वी दे॒वेषु॑ यज॒ता य॑जत्र । रत्ना॑ च॒ यद्वि॒भजा॑सि स्वधावोभा॒गं नो॒ अत्र॒ वसु॑मन्तं वीतात् ॥ (२६)
हे अग्नि! तुम पूजा करने योग्य हो. जब देवताओं में स्रोतों और हवियों की संगति हो, तब तुम स्तुति करने वालों के लिए रत्न दाता बनो तथा उन्हें बहुत धन प्रदान करो. (२६)
O agni! You are worthy of worship. When there is the company of sources and goddesses among the gods, then be the jewel giver to those who praise and give them a lot of money. (26)