हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.1.32

कांड 18 → सूक्त 1 → मंत्र 32 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
स्वावृ॑ग्दे॒वस्या॒मृतं॒ यदी॒ गोरतो॑ जा॒तासो॑ धारयन्त उ॒र्वी । विश्वे॑ दे॒वाअनु॒ तत्ते॒ यजु॑र्गुर्दु॒हे यदेनी॑ दि॒व्यं घृ॒तं वाः ॥ (३२)
अमृत के समान उपकार करने वाला जल जब किरणों से प्रकट होता है, तब ओषधियां आकाश और पृथ्वी में व्याप्त होती हैं. जब अग्नि की दीप्तियां अंतरिक्ष से टपकने वाले जल का दोहन करती हैं, तब हे अग्नि! उस जल का सब अनुगमन करते हैं जो तुम्हारे द्वारा प्रकट किया जाता है. (३२)
When the water that does the same favor as nectar appears from the rays, then the medicines permeate the sky and the earth. When the radiants of agni harness the water dripping from space, then O agni! Everyone follows the water that is revealed by you. (32)