हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.1.50

कांड 18 → सूक्त 1 → मंत्र 50 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
य॒मो नो॑ गा॒तुंप्र॑थ॒मो वि॑वेद॒ नैषा गव्यू॑ति॒रप॑भर्त॒वा उ॑ । यत्रा॑ नः॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॒परे॑ता ए॒ना ज॑ज्ञा॒नाः प॒थ्या॒ अनु॒ स्वाः ॥ (५०)
यम ने सब से पहले हमारे मार्ग को जाना. यह मार्ग अपसरण अर्थात्‌ छुटकारे के लिए नहीं है. इस मार्ग से छुटकारा नहीं पाया जा सकता. जहां पर हमारे पूर्वज पितर गए हैं, इस मार्ग को न जानने वाले प्राणी अपनेअपने कर्मो के अनुसार जाते हैं. (५०)
Yama first of all went our way. This route is not for divergence i.e. redemption. This route cannot be got rid of. Where our ancestors have gone, the creatures who do not know this path go according to their own deeds. (50)