अथर्ववेद (कांड 18)
इ॒मं य॑मप्रस्त॒रमा हि रोहाङ्गि॑रोभिः पि॒तृभिः॑ संविदा॒नः । आ त्वा॒ मन्त्राः॑कविश॒स्ता व॑हन्त्वे॒ना रा॑जन्ह॒विषो॑ मादयस्व ॥ (६०)
हे यम! तुम अंगिरा नाम वाले पितरों के समान मति वाले बन कर कुश के इस आसन पर बैठी. महर्षियों के मंत्र तुम्हें बुलाने में समर्थ हों. तुम हवि प्राप्त कर के प्रसन्न बनो. (६०)
O Yama! You sat on this seat of Kush as a mother like the ancestors named Angira. May the mantras of maharishis be able to call you. Be happy to get the havi. (60)