हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.2.26

कांड 18 → सूक्त 2 → मंत्र 26 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
यत्ते॒अङ्ग॒मति॑हितं परा॒चैर॑पा॒नः प्रा॒णो य उ॑ वा ते॒ परे॑तः । तत्ते॑ सं॒गत्य॑पि॒तरः॒ सनी॑डा घा॒साद्घा॒सं पुन॒रा वे॑शयन्तु ॥ (२६)
हे प्रेत! तेरा जो अंग तेरे शरीर से अलग हो गया था, जो प्राण वापस न होने के लिए तेरे शरीर से निकल गए थे, उन सब को एक स्थान पर स्थित पितर तुझे एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रविष्ट करें. (२६)
O ghost! May the father in one place enter you from one body to another all your part that was separated from your body, which was separated from your body, which was separated from your body, to not return to life. (26)