हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.2.47

कांड 18 → सूक्त 2 → मंत्र 47 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
ये अग्र॑वःशशमा॒नाः प॑रे॒युर्हि॒त्वा द्वेषां॒स्यन॑पत्यवन्तः । ते द्यामु॒दित्या॑विदन्तलो॒कं नाक॑स्य पृ॒ष्ठे अधि॒ दीध्या॑नाः ॥ (४७)
जो पितर संतान रहित होने पर भी पापों का त्याग करते हुए परलोक में गए, वे अंतरिक्ष को लांघ कर स्वर्ग के ऊपरी भाग में निवास करते हैं तथा पुण्य का फल प्राप्त करते हैं. (४७)
Those ancestors who went to the hereafter renouncing sins even when they are without children, they cross the space and live in the upper part of heaven and get the fruits of virtue. (47)