अथर्ववेद (कांड 18)
आ यू॒थेव॑क्षु॒मति॑ प॒श्वो अ॑ख्यद्दे॒वानां॒ जनि॒मान्त्यु॒ग्रः।मर्ता॑सश्चिदु॒र्वशीर॑कृप्रन्वृ॒धे चि॑द॒र्य उप॑रस्या॒योः ॥ (२३)
हे अग्नि! तुम्हारे द्वारा भस्म किया जाता हुआ यह यजमान देवताओं के प्रादुर्भाव को देखे. मरणधर्मा मनुष्य तुम्हारी कृपा से उर्वशी आदि अप्सराओं को भोगने वाले होते हैं. तुम्हारी कृपा से देवत्व को प्राप्त मनुष्य भी गर्भाशय में स्थित जीवन की वृद्धि वाला होता है. (२३)
O agni! This host, consumed by you, sees the emergence of the gods. By your grace, people are going to enjoy apsaras like Urvashi etc. By your grace, a person who attains divinity is also the one who grows life located in the uterus. (23)