अथर्ववेद (कांड 18)
धा॒ता मा॒निरृ॑त्या॒ दक्षि॑णाया दि॒शः पा॑तु बाहु॒च्युता॑ पृथि॒वी द्यामि॑इवो॒परि॑।लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥ (२६)
दक्षिण के धाता देव पाप की देवी निर्त्रति के भय से मेरी रक्षा करें. दाता के द्वारा दी गई पृथ्वी जिस प्रकार स्वर्ग के उपभोक्ता की रक्षा करती है, उसी प्रकार मेरी रक्षा करने वाली हो. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों को हम हवि के द्वारा पूजते हैं. हे देवगण! इस यज्ञ में तुम भाग प्राप्त करने वाले बनो. (२६)
May the Dhata Dev of the South protect me from the fear of nirtrati, the goddess of sin. Just as the earth given by the Giver protects the consumer of heaven, so it is going to protect me. As the fruit of virtue, we worship those who initiate the way to heaven through Havi. O Gods! Become the one who gets a part in this yajna. (26)