हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.3.40

कांड 18 → सूक्त 3 → मंत्र 40 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
त्रीणि॑ प॒दानि॑रु॒पो अन्व॑रोह॒च्चतु॑ष्पदी॒मन्वे॑तद्व्र॒तेन॑ । अ॒क्षरे॑ण॒ प्रति॑ मिमीतेअ॒र्कमृ॒तस्य॒ नाभा॑व॒भि सं पु॑नाति ॥ (४०)
मृत पुरुष स्वर्ग में स्थित तीन सीढ़ियों को क्रम से चढ़ गया था. वह इस अनुत्तरणी गौ को ध्यान में रखता हुआ द्युलोक के तीनों स्थानों में पहुंचा. तुम अपने द्वारा अर्जित विनाश रहित पुण्य से सूर्यलोक को प्राप्त करो. इस प्रकार व्यक्ति सूर्य के समान हो जाता है. सूर्य में फल सभी ओर से पूर्ण है. (४०)
The dead man had climbed three stairs located in heaven in order. He reached all three places of Dulok keeping this unresponsive cow in mind. You attain the sunland with the virtue without destruction earned by you. In this way, the person becomes like the sun. The fruit in the sun is complete on all sides. (40)