अथर्ववेद (कांड 18)
आ रो॑हत॒जनि॑त्रीं जातवेदसः पितृ॒याणैः॒ सं व॒ आ रो॑हयामि । अवा॑ड्ढ॒व्येषि॒तो ह॑व्यवा॒हई॑जा॒नं यु॒क्ताः सु॒कृतां॑ धत्त लो॒के ॥ (१)
हे अग्नियो! तुम अपनी उत्पन्न करने वाली के पास पहुंचो. मैं तुम्हें पितृयान मार्गो से वहां भलीभांति पहुंचाता हूं. हव्यों के वाहक अग्नि हव्यों को वहन करते हैं. हे अग्नियो! तुम मिल कर यज्ञकर्ताओं को श्रेष्ठ कर्म करने वालों के लोकों में पहुंचाओ. (१)
O agni! You reach out to your creator. I take you there well through pitrayana routes. The carriers of the havyas carry the agni havyas. O agni! Together, bring the yajnayas to the worlds of those who do the best deeds. (1)
अथर्ववेद (कांड 18)
दे॒वाय॒ज्ञमृ॒तवः॑ कल्पयन्ति ह॒विः पु॑रो॒डाशं॑ स्रु॒चो य॑ज्ञायु॒धानि॑।तेभि॒र्याहि॑ प॒थिभि॑र्देव॒यानै॒र्यैरी॑जा॒नाः स्व॒र्गं य॑न्ति लो॒कम् ॥ (२)
देवगण और वसंत आदि ऋतुएं अनेक प्रकार के यज्ञों की रचना करते हैं. इस यज्ञ में डालने के लिए घृत आदि से बनाए हुए पदार्थों को अग्ने में डालने के लिए चमचे की आकृति के अनेक पात्र बनाते हैं. हे मनुष्य! उन देवयान मार्गो अर्थात् यज्ञ करने की विधियों से तू नित्य प्रति यज्ञ कर. इन देवयान मार्गो से यज्ञ करने वाले जन स्वर्गलोक जाते हैं. (२)
The seasons of devgan and spring etc. create many types of yagyas. To put in this yajna, many characters of the shape of a spoon are made to put the substances made from ghee etc. in the agni. O man! With those Devayana paths, that is, by the methods of performing yajna, you should always perform yajna. People who perform yajna through these Devayan routes go to heaven. (2)
अथर्ववेद (कांड 18)
ऋ॒तस्य॒पन्था॒मनु॑ पश्य सा॒ध्वङ्गि॑रसः सु॒कृतो॒ येन॒ यन्ति॑ । तेभि॒र्याहि॑ प॒थिभिः॑स्व॒र्गं यत्रा॑दि॒त्या मधु॑ भ॒क्षय॑न्ति तृ॒तीये॒ नाके॒ अधि॒ वि श्र॑यस्व ॥ (३)
हे प्रेत! तू सत्य के कारण रूप मार्गो को भलीभांति जानता हुआ महर्षि अंगिरस आदि के स्वर्ग को जा, जिस मार्ग में अदिति के पुत्र देवगण अमृत का सेवन करते हैं. तू उस तीसरे स्वर्ग में निवास कर. (३)
O ghost! You know the forms well because of the truth and go to the heaven of Maharishi Angiras etc., in which Aditi's sons eat nectar. Dwell in that third heaven. (3)
अथर्ववेद (कांड 18)
त्रयः॑ सुप॒र्णाउप॑रस्य मा॒यू नाक॑स्य पृ॒ष्ठे अधि॑ वि॒ष्टपि॑ श्रि॒ताः । स्व॑र्गा लो॒काअ॒मृते॑न वि॒ष्ठा इष॒मूर्जं॒ यज॑मानाय दुह्राम् ॥ (४)
अग्नि, वायु और सूर्य उत्तम विधि से गमन करने वाले हैं. वायु तथा पर्जन्य मेघ के समान शब्द करते हैं. ये सभी स्वर्गलोक से ऊपर विष्टप में निवास करते हैं. अपने कर्मो से प्राप्त होने वाला यह स्वर्गलोक अमृत से संपन्न है. यह स्वर्ग यज्ञ कर्म का अनुष्ठान करने वाले प्रेत को मनचाहा अन्न तथा रस देने वाला है. (४)
Agni, air and sun are going to move in the best way. Air and parajanya do the same terms as cloud. All of them reside in Vishtapa above heaven. This heaven, which is obtained from its deeds, is endowed with nectar. This heaven is going to give the desired food and juice to the ghost who performs the ritual of yajna karma. (4)
अथर्ववेद (कांड 18)
जु॒हूर्दा॑धार॒द्यामु॑प॒भृद॒न्तरि॑क्षं ध्रु॒वा दा॑धार पृथि॒वीं प्र॑ति॒ष्ठाम् । प्रती॒मांलो॒का घृ॒तपृ॑ष्ठाः स्व॒र्गाः कामं॑कामं॒ यज॑मानाय दुह्राम् ॥ (५)
होम के पात्र जुहू ने आकाश को पुष्ट किया, उपभूत नाम के यज्ञपात ने अंतरिक्ष को धारण किया तथा खुवा नाम के यज्ञ पात्र ने पृथ्वी का पालन किया. यह सुवा पात्र पृथ्वी का ध्यान करते हुए ऊपर स्थित स्वर्गलोक में यजमान को मनचाहा फल प्रदान करे. (५)
The character of the home, Juhu, strengthened the sky, the yajnapat named Upbhuta took up the space and the sacrificial character named Khuva followed the earth. This suva vessel should pay attention to the earth and provide the desired fruit to the host in heaven located above. (5)
अथर्ववेद (कांड 18)
ध्रुव॒ आ रो॑हपृथि॒वीं वि॒श्वभो॑जसम॒न्तरि॑क्षमुप॒भृदा क्र॑मस्व । जुहु॒ द्यां ग॑च्छ॒ यज॑मानेनसा॒कं स्रु॒वेण॑ व॒त्सेन॒ दिशः॒ प्रपी॑नाः॒ सर्वा॑ धु॒क्ष्वाहृ॑णीयमानः ॥ (६)
हे खुवा नामक चम्मच! तू पृथ्वी पर आरोहण कर और यजमान भी पृथ्वी पर प्रतिष्ठित रहे. हे उपभृत नाम के पात्र! तू अंतरिक्ष पर आरोहण कर. हे जुहू नामक पात्र! तू यजमान के साथ द्युलोक अर्थात् स्वर्ग को गमन कर तथा सभी दिशाओं से मनचाहे फलों का दोहन कर. (६)
O spoon called khuva! You ascend to the earth, and the host may also be distinguished on the earth. O characters named Ayavrit! You climb on space. O character called Juhu! You go to Dyulok i.e. heaven with the host and exploit the desired fruits from all directions. (6)
अथर्ववेद (कांड 18)
ती॒र्थैस्त॑रन्तिप्र॒वतो॑ म॒हीरिति॑ यज्ञ॒कृतः॑ सु॒कृतो॒ येन॒ यन्ति॑ । अत्रा॑दधु॒र्यज॑मानायलो॒कं दिशो॑ भू॒तानि॒ यदक॑ल्पयन्त ॥ (७)
लोग तीर्थो तथा यज्ञादि कर्मो के द्वारा बड़ीबड़ी विपत्तियों से पार हो जाते हैं. इस प्रकार विचार करने वाले तथा यज्ञ कर्म करते हुए पुरुष जिस मार्ग से स्वर्ग को जाते हैं, उस मार्ग को खोजते हुए यज्ञ कर्ता इस यजमान के लिए वह मार्ग खोलें. (७)
People overcome great calamities through pilgrimages and sacrifices. In this way, those who think and do yajna karma, while searching for the path through which men go to heaven, the yajna karta should open that path for this host. (7)
अथर्ववेद (कांड 18)
अङ्गि॑रसा॒मय॑नं॒पूर्वो॑ अ॒ग्निरा॑दि॒त्याना॒मय॑नं॒ गार्ह॑पत्यो॒ दक्षि॑णाना॒मय॑नं दक्षिणा॒ग्निः । म॑हि॒मान॑म॒ग्नेर्विहि॑तस्य॒ ब्रह्म॑णा॒ सम॑ङ्गः॒ सर्व॒ उप॑ याहि श॒ग्मः ॥ (८)
आंगिरसों का मार्ग पूर्व के नाम की अग्नि है. आदित्यों का मार्ग गार्हपत्य अग्नि है. यज्ञ कार्य में दक्ष जनों का मार्ग दक्षिणा अग्नि है. वेदमंत्रों के द्वारा यज्ञ में स्थापित की गई अग्नि की महिमा को दृढ़ अंगों तथा पूर्ण शरीर वाला तू प्राप्त कर. (८)
The path of the Angiras is the agni of the name of the east. The path of adityas is the agni of garhapatya. Dakshina Agni is the path of skilled people in yajna work. You get the glory of agni established in the yajna through Veda mantras with strong limbs and full body. (8)