हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
दि॒वस्पृ॑थि॒व्याः पर्य॒न्तरि॑क्षा॒द्वन॒स्पति॑भ्यो॒ अध्योष॑धीभ्यः । यत्र॑यत्र॒ विभृ॑तो जा॒तवे॑दा॒स्तत॑ स्तु॒तो जु॒षमा॑णो न॒ एहि॑ ॥ (१)
हे अग्नि देव! आकाश से पृथ्वी से अंतरिक्ष से, वनस्पतियों से, ओषधियों से तथा जहांजहां तुम विशेष रूप से पूर्ण हो, वहांवहां से हमें प्रसन्न करते हुए यहां आओ. (१)
O God of Agni! From the sky to earth to space, from the vegetation, from the medicines and where you are especially complete, come here to please us from there. (1)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यस्ते॑ अ॒प्सु म॑हि॒मा यो वने॑षु॒ य ओष॑धीषु प॒शुष्व॒प्स्वन्तः । अग्ने॒ सर्वा॑स्त॒न्वः सं र॑भस्व॒ ताभि॑र्न॒ एहि॑ द्रविणो॒दा अज॑स्रः ॥ (२)
हे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा वाडवाग्नि रूप से जलों में वर्तमान है, दावाग्नि रूप से वनों में विद्यमान है, जो ओषधियों में फल के पकने का कारण बनती है, जो सभी प्राणियों में जठराग्नि के रूप में स्थित है तथा जो विद्युत के रूप में बादलों में रहती है, इन सब को एकत्र कर के नित्य धनदाता के रूप में आओ. (२)
O agni! Your glory, which is present in the waters, is present in the forests, which causes the ripening of fruits in medicines, which is located in the form of gastritis in all living beings and which lives in the clouds in the form of electricity, collect all these and come as a daily giver. (2)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
यस्ते॑ दे॒वेषु॑ महि॒मा स्व॒र्गो या ते॑ त॒नूः पि॒तृष्वा॑वि॒वेश॑ । पुष्टि॒र्या ते॑ मनु॒ष्येषु पप्र॒थेऽग्ने॒ तया॑ र॒यिम॒स्मासु॑ धेहि ॥ (३)
हे अग्नि! तुम्हारी जो महिमा स्वर्गगामी के रूप में देवों में है, तुम्हारा जो नाम का हवि स्वधा के रूप में पितृलोक जाने वाला है तथा मनुष्य, पशु आदि चराचर में तुम्हारी जो पुष्टि है, अपने उन सभी रूपों के द्वारा हमें धन दो. (३)
O agni! Give us wealth through all your forms, the glory of yours which is going to go to the fatherland in the form of heavenly, your name is going to go to the fatherland in the form of havi swadha and your confirmation in the pasture of human beings, animals, etc. (3)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
श्रुत्क॑र्णाय क॒वये॒ वेद्या॑य॒ वचो॑भिर्वा॒कैरुप॑ यामि रा॒तिम् । यतो॑ भ॒यमभ॑यं॒ तन्नो॑ अ॒स्त्वव॑ दे॒वानां॑ यज॒ हेडो॑ अग्ने ॥ (४)
हे अग्नि देव! तुम हमारे स्तोत्रों को सुनने में समर्थ करने वाले, मनचाहा फल देने वाले एवं सब के द्वारा जानने योग्य हो. मैं मंत्र रूप वाक्यों, अनुवाकों तथा सूक्तों से तुम्हारी स्तुति करता हूं, जिस से मुझे अभय प्राप्त हो, जो देव हमारे प्रति क्रोध करते हों, तुम उन का क्रोध शांत करो. (४)
O God of Agni! You are able to hear our hymns, give you the desired fruit and know it by all. I praise you with mantras, sentences, anuktas and suktas, so that I may be blessed, that the gods who are angry with us, you calm their anger. (4)