अथर्ववेद (कांड 19)
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह । वा॒युर्मा॒ तत्र॑ नयतु वा॒युः प्र॒णान्द॑धातु मे । वा॒यवे॒ स्वाहा॑ ॥ (२)
सगुण ब्रह्म के स्वरूप को जानने वाले दीक्षा और तप के कारण जहां जाते हैं, वायु मुझे वहां ले जाएं तथा वायु मुझ में प्राणों का आधान करें. यह आहुति भलीभांति वायु को प्राप्त हो. (२)
Wherever those who know the nature of Sagun Brahm go due to initiation and penance, the wind should take me there and the wind should place life in me. This sacrifice should be received by the air well. (2)