हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 19.45.7

कांड 19 → सूक्त 45 → मंत्र 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 45
इन्द्रो॑ मेन्द्रि॒येणा॑वतु प्रा॒णाया॑पा॒नायायु॑षे॒ वर्च॑स॒ ओज॑से तेज॑से स्व॒स्तये॑ सुभू॒तये॒ स्वाहा॑ ॥ (७)
हे साधक! तुम सब से श्रेष्ठ बनो. कोई तुम्हारा शत्रु न बने तथा तुम सभी शत्रुओं का विनाश करो. तुम अपने सजातीय जनों के मध्य में दूसरों को वश में करने वाले बनो. सविता देव मणि बांधने वाले तुम को इसी प्रकार का करें. आस्तृत मणि तुम्हारी रक्षा करे. (७)
O seeker! Be the best of all of you. Let no one be your enemy and destroy all your enemies. You become the one who subdues others among your homogeneous people. Those who tie Savita Dev Mani should do this to you. May the overstate gem protect you. (7)