अथर्ववेद (कांड 19)
आ रा॑त्रि॒ पार्थि॑वं॒ रजः॑ पि॒तुर॑प्रायि॒ धाम॑भिः । दि॒वः सदां॑सि बृह॒ती वि ति॑ष्ठस॒ आ त्वे॒षं व॑र्तते॒ तमः॑ ॥ (१)
हे रात्रि! तुम ने अपने अंधकारों से पृथ्वीलोक तथा पितरों के लोक स्वर्ग को पूर्ण कर दिया है. महती रात्रि द्युलोक के स्थानों को विशेष रूप ये व्याप्त करती है. नील वर्ण का अंधकार सब को व्याप्त करता है. (१)
O night! You have completed the earth and the world heaven of fathers with your darkness. The great night especially covers the places of Dulok. The darkness of the blue color pervades everyone. (1)
अथर्ववेद (कांड 19)
न यस्याः॑ पा॒रं ददृ॑शे॒ न योयु॑व॒द्विश्व॑म॒स्यां नि वि॑शते॒ यदेज॑ति । अरि॑ष्टासस्त उर्वि तमस्वति॒ रात्रि॑ पा॒रम॑शीमहि॒ भद्रे॑ पा॒रम॑शीमहि ॥ (२)
रात का पार दिखाई नहीं देता है. लोक व्यापिनी रात्रि में चराचर विश्व एकाकार ही हो जाता है, अलगअलग दिखाई नहीं देता है. जगत् कांपता है, तथा प्राणी इस रात्रि में इधरउधर जाने में असमर्थ हो जाते हैं. हे अंधकार वाली रात्रि! सर्प, बाघ, चोर आदि की बाधा से रहित हम तेरे अंतिम नाम अर्थात् प्रातःकाल को प्राप्त करें. हे कल्याणकारिणी रात्रि! हम कल्याण को प्राप्त करें. (२)
The night crossing is not visible. At night, the world becomes one and the same, not visible separately. The world trembles, and the creatures are unable to move around at night. O dark night! May we attain Your last name i.e. morning without the obstacles of snakes, tigers, thieves, etc. This is a good night! Let us achieve welfare. (2)
अथर्ववेद (कांड 19)
ये ते॑ रात्रि नृ॒चक्ष॑सो द्र॒ष्टारो॑ नव॒तिर्नव॑ । अ॑शी॒तिः सन्त्य॒ष्टा उ॒तो ते॑ स॒प्त स॑प्त॒तिः ॥ (३)
हे रात्रि! मनुष्यों के कर्म फल के देखने वाले तुम्हारे जो निन्यानवे गण देवता हैं, अठासी गण देवता हैं तथा सतहत्तर गण देवता हैं, वे तुम्हारी महिमा का विस्तार करते हैं. (३)
O night! The ninety-nine Gana deities, the eighty-eight Gana deities and the seventy-seven Gana deities who see the fruits of human deeds, expand your glory. (3)
अथर्ववेद (कांड 19)
ष॒ष्टिश्च॒ षट्च॑ रेवति पञ्चा॒शत्पञ्च॑ सुम्नयि । च॒त्वार॑श्चत्वारिं॒शच्च॒ त्रय॑स्त्रिं॒शच्च॑ वाजिनि ॥ (४)
हे धन प्रदान करने वाली रात्रि! छियासठ और पचपन जो गण देवता हैं, हे सुख देने वाली रात्रि! चवालीस जो गण देवता हैं, हे अन्न प्रदान करने वाली रात्रि! तैंतीस जो गण देवता हैं, वे तुम्हारी महिमा का विस्तार करते हैं. (४)
O night of wealth! Sixty-six and fifty-five who are gana gods, O night of happiness! Forty-four who are gana deities, O night of food! Thirty-three gana deities expand your glory. (4)
अथर्ववेद (कांड 19)
द्वौ च॑ ते विंश॒तिश्च॑ ते॒ रात्र्येका॑दशाव॒माः । तेभि॑र्नो अ॒द्य पा॒युभि॒र्नु पा॑हि दुहितर्दिवः ॥ (५)
हे रात्रि! तुम्हारे जो बाईस और ग्यारह गण देवता हैं तथा इस से कम संख्या वाले जो गण देवता हैं, हे झुलोक की पुत्री रात्रि! इस समय उन रक्षक गण देवों के साथ हमारी रक्षा करो. (५)
O night! The twenty-two and eleven ganas of your gods and those who are less than this number, O daughter of Jhuloka, night! At this time, protect us with those protectors. (5)
अथर्ववेद (कांड 19)
रक्षा॒ माकि॑र्नो अ॒घशं॑स ईशत॒ मा नो॑ दुः॒शंस॑ ईशत । मा नो॑ अ॒द्य गवां॑ स्ते॒नो मावी॑नां॒ वृक॑ ईशत ॥ (६)
हे रात्रि! हमारा पालन करो, पाप कर्म करने की बात कहने वाला कोई भी हमें बाधा पहुंचाने में समर्थ न हो. दुष्टता पूर्ण वचन बोलने वाला हमें बाधा न पहुंचाए. हे रात्रि! आज चोर हमारी सभी गायों को चुराने में समर्थ न हो. भेड़िया हमारी भेड़ों का बलपूर्वक अपहरण करने में समर्थ न हो. (६)
O night! Follow us, no one who says to commit sins should be able to hinder us. Let the evil-speaking word not hinder us. O night! Today, thieves may not be able to steal all our cows. The wolf should not be able to abduct our sheep by force. (6)
अथर्ववेद (कांड 19)
माश्वा॑नां भद्रे॒ तस्क॑रो॒ मा नृ॒णां या॑तुधा॒न्यः । प॑र॒मेभिः॑ प॒थिभिः॑ स्ते॒नो धा॑वतु॒ तस्क॑रः । परे॑ण द॒त्वती॒ रज्जुः॒ परे॑णाघा॒युर॑र्षतु ॥ (७)
हे भली रात्रि! चोर हमारे घोड़ों को चुराने में समर्थ न हो तथा यातुधान हमारे पुत्रों आदि के स्वामी न बन सकें. चोर और तस्कर अति दूर मार्गो से अपने साधनं द्वारा दूर भाग जाएं. दांतों वाली रस्सी के समान विशाल सर्प दूर भाग जाएं. दूसरों की हिंसा करने के इच्छुक हम से दूर चले जाएं. (७)
Good night! Thieves may not be able to steal our horses and yatudhans cannot become masters of our sons etc. Thieves and smugglers should run away from far away routes by their means. A giant snake like a rope with teeth runs away. Move away from us willing to do violence against others. (7)
अथर्ववेद (कांड 19)
अध॑ रात्रि तृ॒ष्टधू॑ममशी॒र्षाण॒महिं॑ कृणु । हनू॒ वृक॑स्य ज॒म्भया॑स्ते॒नं द्रु॑प॒दे ज॑हि ॥ (८)
हे रात्रि! प्यास उत्पन्न करने वाले तथा धुआं छोड़ने वाले सर्प को तुम बिना शीश वाला बनाओ अर्थात् मार डालो. दृढ़ दाढ़ों के कारण दूसरों का भक्षण करने वाले भेड़ियों को टूटी हुई ठोड़ी वाला बना कर नष्ट करो. हे सर्वत्र व्याप्त रात्रि उस भेड़िए को मारो. (८)
O night! Make the snake that causes thirst and emits smoke without a head, that is, kill it. Destroy wolves that feed others because of firm molars by making them with broken chins. O night, kill that wolf everywhere. (8)