अथर्ववेद (कांड 19)
इ॑षि॒रा योषा॑ युव॒तिर्दमू॑ना॒ रात्री॑ दे॒वस्य॑ सवि॒तुर्भग॑स्य । अ॑श्वक्ष॒भा सु॒हवा॒ संभृ॑तश्री॒रा प॑प्रौ॒ द्यावा॑पृथि॒वी म॑हि॒त्वा ॥ (१)
सब के द्वारा प्रार्थनीय, यौवन वाली तथा श्रेष्ठ मन वाली रात्रि सभी के प्रेरक सविता और भग देव की पत्नी है. यह अपने विषय में चक्षु आदि इंद्रियों का तिरस्कार करती है. यह उत्तम हवन करने योग्य तथा संपूर्ण कांति वाली रात्रि अपने महत्त्व से द्यावा और पृथ्वी को पूर्ण करती है. (१)
The night of praiseworthy, youth and superior mind by all is the inspiring savita of all and the wife of God. It despises the eyes and senses in its subject. This good havan-able and completes the earth with its importance. (1)
अथर्ववेद (कांड 19)
अति॒ विश्वा॑न्यरुहद्गम्भी॒रो वर्षि॑ष्ठमरुहन्त॒ श्रवि॑ष्ठाः । उ॑श॒ती रात्र्यनु॒ सा भ॑द्रा॒भि ति॑ष्ठते मि॒त्र इ॑व स्व॒धाभिः॑ ॥ (२)
जिस में प्रवेश करना कठिन है, ऐसी रात्रि सभी चराचर वस्तुओं को व्याप्त कर के वर्तमान है. इस अतिशय अन्न वाली रात्रि की सब स्तुति करते हैं. यह वन, पर्वत, सागर आदि को व्याप्त कर के स्थित है. यजमान आदि के द्वारा प्रदत्त अन्न आदि साधनों से सूर्य जिस प्रकार अपने तेज से प्रतिक्षण विश्व को आक्रांत करते हैं, उसी प्रकार यह रात्रि भी जगत् पर छा जाती है. (२)
In which it is difficult to enter, such a night is present by pervading all the grazing items. Everyone praises this very food night. It is located by spreading forests, mountains, oceans etc. Just as the sun attracts the world every moment with its brightness with the means of food etc. provided by the host etc., in the same way, this night also covers the world. (2)
अथर्ववेद (कांड 19)
वर्ये॒ वन्दे॒ सुभ॑गे॒ सुजा॑त॒ आज॑ग॒न्रात्रि॑ सु॒मना॑ इ॒ह स्या॑म् । अ॒स्मांस्त्रा॑यस्व॒ नर्या॑णि जा॒ता अथो॒ यानि॒ गव्या॑नि पु॒ष्ठ्या ॥ (३)
हे न रुकने वाले प्रभाव वाली, सभी के द्वारा स्तुति की गई, सौभाग्य वाली तथा भलीभांति उत्पन्न रात्रि! तुम आ गई हो. तुम्हारे आने पर मैं सुंदर मन वाला बनूं. मेरा पालन करो तथा उत्पन्न वस्तुओं को, मनुष्यों की हितकारी वस्तुओं को तथा पुष्ट करने वाली गाय आदि जो हितकारी वस्तुएं हैं, उन की रक्षा करो. (३)
O night of unspeakable influence, praised by all, blessed and well-generated! You have arrived. When you come, I will be beautiful-minded. Obey Me and protect the goods produced, the things that are beneficial to human beings and the beneficial things that strengthen the cow, etc. (3)
अथर्ववेद (कांड 19)
सिं॒हस्य॒ रात्र्यु॑श॒ती पीं॒षस्य॑ व्या॒घ्रस्य॑ द्वी॒पिनो॒ वर्च॒ आ द॑दे । अश्व॑स्य ब्र॒ध्नं पुरु॑षस्य मा॒युं पु॒रु रू॒पाणि॑ कृणुषे विभा॒ती ॥ (४)
इच्छा करती हुई यह रात्रि सिंह, हाथी, गैंडा, बाघ आदि के तेजों का अपहरण करती है. यह अश्च के वेग को तथा पुरुष के शब्द को खींच लेती है. हे रात्रि! तुम दीप्तिमती हो कर नाना प्रकार के रूप धारण करती हो. (४)
Wishing, this night kidnaps the tejas of lions, elephants, rhinos, tigers, etc. It pulls the velocity of the ashch and the word of the man. O night! You are radiant and take various types of forms. (4)
अथर्ववेद (कांड 19)
शि॒वां रात्रि॑मनु॒सूर्यं॑ च हि॒मस्य॑ मा॒ता सु॒हवा॑ नो अस्तु । अ॒स्य स्तोम॑स्य सुभगे॒ नि बो॑ध॒ येन॑ त्वा॒ वन्दे॒ विश्वा॑सु दि॒क्षु ॥ (५)
हे रात्रि! मैं कल्याण करने वाली तेरी तथा सूर्य की वंदना करता हूं. तुषार की माता रात्रि हमारे उत्तम आह्वान का विषय हो. हे सौभाग्यशालिनी रात्रि! तुम इस समय किए जाते हुए हमारे स्तोत्र को जानो. इस स्तोत्र के द्वारा हम सभी दिशाओं में तेरी वंदना करते हैं. (५)
O night! I worship you and the sun who do welfare. May Tushar's mother night be the subject of our best call. O good lucky night! You know our psalms while you are doing this time. Through this hymn, we worship You in all directions. (5)
अथर्ववेद (कांड 19)
स्तोम॑स्य नो विभावरि॒ रात्रि॒ राजे॑व जोषसे । असा॑म॒ सर्व॑वीरा॒ भवा॑म॒ सर्व॑वेदसो व्यु॒च्छन्ती॒रनू॒षसः॑ ॥ (६)
हे प्रकाशित होती हुई रात्रि! जिस प्रकार राजा स्तोताओं के द्वारा की जाती हुई स्तुति को ध्यानपूर्वक सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को सावधान हो कर सुनो. अंधकार का विनाश करती हुई एवं उषाःकाल के पश्चात आती हुई रात्रि की कृपा से हम वीर पुत्रों, पौत्रों और सेवकों वाले बनें तथा सभी प्रकार के धन से संपन्न हों. (६)
O night! Just as the king listens carefully to the praise made by the psalms, so you listen carefully to our praises. By the grace of the night, destroying darkness and coming after the dawn, we become brave sons, grandsons and servants and be endowed with all kinds of wealth. (6)
अथर्ववेद (कांड 19)
शम्या॑ ह॒ नाम॑ दधि॒षे मम॒ दिप्स॑न्ति॒ ये धना॑ । रात्री॒हि तान॑सुत॒पा य स्ते॒नो न वि॒द्यते॒ यत्पुन॒र्न वि॒द्यते॑ ॥ (७)
हे रात्रि! तुम शम्या अर्थात् शत्रु के बल को शांत करने वाला नाम धारण करती हो. जो शत्रु मेरे धनों का अपहरण करने की इच्छा करते हैं, हे रात्रि! तुम उन शत्रुओं के प्राणों को संतप्त करती हुई आओ. मेरा विरोधी जो दिखाई दे रहा है, वह पुनः दिखाई न दे. (७)
O night! You wear the name Shamya i.e. the one who calms the force of the enemy. The enemies who wish to kidnap my wealth, O night! Come, anguishing the lives of those enemies. My opponent who is visible may not reappear. (7)
अथर्ववेद (कांड 19)
भ॒द्रासि॑ रात्रि चम॒सो न वि॒ष्टो विष्व॒ङ्गोरू॑पं युव॒तिर्बि॑भर्षि । चक्षु॑ष्मती मे उश॒ती वपूं॑षि॒ प्रति॒ त्वं दि॒व्या न क्षा॑ममुक्थाः ॥ (८)
हे रात्रि! तुम चम्मच के समान कल्याण रूपा हो. तुम सर्वत्र व्याप्त यौवन वाली गाय का रूप धारण करती हो. हमारा पोषण करने की कामना करती हुई एवं देखने की शक्ति से संपन्न तुम मेरे तथा मेरे पुत्र आदि के शरीरों की रक्षा करो. जिस प्रकार दिव्य पुरुष शरीर का त्याग नहीं करते, उसी प्रकार तुम धरती को मत छोड़ो. (८)
O night! You are the same as the chickpea of the spoon. You take the form of a cow with youth everywhere. May you protect the bodies of me and my son etc. wishing to nourish us and endowed with the power to see. Just as divine men do not give up the body, so do not leave the earth. (8)