अथर्ववेद (कांड 19)
यस्य॑ क्रू॒रमभ॑जन्त दु॒ष्कृतो॒ऽस्वप्ने॑न सु॒कृतः॒ पुण्य॒मायुः॑ । स्वर्मदसि पर॒मेण॑ ब॒न्धुना॑ त॒प्यमा॑नस्य॒ मन॒सोऽधि॑ जज्ञिषे ॥ (५)
पापी पुरुष उस दुःस्वप्न का भयंकर फल प्राप्त करते हैं. उत्तम कर्म करने वाले दुःस्वप्न न देख कर पुण्य कर्म करने के लिए आयु प्राप्त करते हैं. हे बुरे स्वप्न! तुम स्वर्गलोक में सर्वश्रेष्ठ विधाता के साथ प्रसन्न रहते हो तथा मृत्यु के पास से संतप्त बुरे कर्म करने वाले पुरुष के मन में मृत्यु की सूचना देने के लिए उत्पन्न होते हो. (५)
Sinful men receive the terrible fruit of that nightmare. Those who do good deeds do not see nightmares and attain life to do virtuous deeds. O nightmare! You are happy with the best creator in heaven and are born from death to inform the mind of a man who commits bad deeds. (5)