हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
यथा॑ क॒लां यथा॑ श॒फं यथ॒र्णं सं॒नय॑न्ति । ए॒वा दुः॒ष्वप्न्यं॒ सर्व॒मप्रि॑ये॒ सं न॑यामसि ॥ (१)
जैसे ऋत्विज्‌ मारे गए बलि पशु को काट कर टुकड़े योग्य अंगों का संस्कार करते हुए खुर आदि प्रयोग में न आने वाले अंगों को साथ ले कर अन्यत्र जाते हैं तथा जिस प्रकार ऋण देने वाले को मूल धन और ब्याज लौटाते हैं, उसी प्रकार बुरे स्वप्न के कारण जितने भी अनर्थ हैं, उन्हें हम जलों के मध्य त्रित नाम के महर्षि पर धारण करते हैं. (१)
Just as the Ritwijas cut off the killed sacrificial animal and take the organs that are not used in the hooves, etc., and return the principal and interest to the lender, in the same way, we hold all the problems caused by bad dreams on the Maharishi named Trit in the middle of the water. (1)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
सं राजा॑नो अगुः॒ समृ॒णान्य॑गुः॒ सं कु॒ष्ठा अ॑गुः॒ सं क॒ला अ॑गुः । सम॒स्मासु॒ यद्दुः॒ष्वप्न्यं॒ निर्द्वि॑ष॒ते दुः॒ष्वप्न्यं॑ सुवाम ॥ (२)
जिस प्रकार राजा लोग दूसरे के राष्ट्र का विनाश करने के लिए एकत्र हो जाते हैं, जिस प्रकार एक ऋण के न चुकाने पर बहुत से ऋण हो जाते हैं, जिस प्रकार कुष्ठ रोग होने पर बहुत से रोग हो जाते हैं, जैसे पशुओं के खुर आदि अनुपयोगी अंग फेंकने से गड्ढे अथवा पुराने कुएं में एकत्र हो जाते हैं, उसी प्रकार हम अपने दुःस्वप्न को उस के पास भेजते हैं जो हम से द्वेष करता है. (२)
Just as kings gather to destroy the nation of another, just as many debts are made on the non-payment of one debt, just as many diseases occur when there is leprosy, such as animal hoofs etc. are collected in the pit or old well by throwing unusable organs, In the same way, we send our nightmares to the one who hates us. (2)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
देवा॑नां पत्नीनां गर्भ॒ यम॑स्य कर॒ यो भ॒द्रः स्व॑प्न । स मम॒ यः पा॒पस्तद्द्वि॑ष॒ते प्र हि॑ण्मः । मा तृ॒ष्टाना॑मसि कृष्णशकु॒नेर्मुख॑म् ॥ (३)
हे स्वप्र! तुम अप्सराओं के गर्भ हो, यमराज के हाथ हो. तुम्हारा जो मंगलकारी अंश है, वह मुझे प्राप्त हो. तुम्हारा जो क्रूर अंश है, उसे मैं उस के पास में भेजता हूं जो मुझ से द्वेष करता है. हे कौए के मुख से उत्पन्न दुःस्वप्न! तुम मेरे लिए बाधक मत बनो. (३)
O self- You are the womb of nymphs, the hands of Yamraj. May I receive the auspicious part of you. I send the cruel part of you to him who hates me. O nightmare arising out of the crow's mouth! Don't be a hindrance to me. (3)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स त्वं स्व॒प्नाश्व॑ इव का॒यमश्व॑ इव नीना॒हम् । अ॑नास्मा॒कं दे॑वपी॒युं पिया॑रुं वप॒ यद॒स्मासु॑ दुः॒ष्वप्न्यं॒ यद्गोषु॒ यच्च॑ नो गृ॒हे ॥ (४)
हे स्वप्न! तुम किस लिए उत्पन्न हुए हो, यह सब हम जाननते हैं. घोड़ा जिस प्रकार अपने धूलि धूसरित अंगों को कंपित करता है और अपनी काठी आदि को दूर फेंक देता है, उसी प्रकार मैं तुम्हें अपने शत्रु के पास तथा देवों के यज्ञों में बाधा डालने वाले के पास फेंकता हूं. हमारे शरीर में, हमारी गायों में और हमारे घरों में जो दुःस्वप्न का फल है, वह हमारे शत्रु और देव शत्रु अर्थात्‌ यज्ञ कर्म में बाधा डालने वाले पर पहुंचे. (४)
O dream! We know everything you were born for. Just as a horse vibrates its dusty gray limbs and throws away its saddle etc., in the same way I throw you to my enemy and to the one who obstructs the sacrifices of the gods. The fruit of the nightmare that is in our body, in our cows and in our homes, it should reach our enemies and god enemies i.e. those who obstruct the yajna karma. (4)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 57
अ॑नास्मा॒कस्तद्दे॑वपी॒युः पिया॑रुर्नि॒ष्कमि॑व॒ प्रति॑ मुञ्चताम् । नवा॑र॒त्नीनप॑मया अ॒स्माकं॒ ततः॒ परि॑ । दुः॒ष्वप्न्यं॒ सर्वं॑ द्विष॒ते निर्द॑यामसि ॥ (५)
हे स्वप्न! तेरे अनिष्ट फल को हमारा तथा देवों का शत्रु अपने शरीर पर स्वर्ण के आभूषण के समान धारण करे. हमारे दुःस्वप्र का जो फल है, वह हम से नौ मुट्ठी दूर हट जाए. हम दुःस्वप्न के बुरे प्रभाव को अपने शत्रु की ओर भेजते हैं. (५)
O dream! Let your evil fruit be worn by our enemy and the enemy of the gods like a gold ornament on his body. Let the fruit of our nightmares move nine fists away from us. We send the evil effects of the nightmare towards our enemy. (5)