हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 2.12.5

कांड 2 → सूक्त 12 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 12
द्यावा॑पृथिवी॒ अनु॒ मा दी॑धीथां॒ विश्वे॑ देवासो॒ अनु॒ मा र॑भध्वम् । अङ्गि॑रसः॒ पित॑रः॒ सोम्या॑सः पा॒पमार्छ॑त्वपका॒मस्य॑ क॒र्ता ॥ (५)
हे द्यावा पृथ्वी! तुम शत्रु को जीतने में मेरे अनुकूल बनो. हे समस्त देवो! तुम मेरे शत्रु को पकड़ने के लिए तैयार हो जाओ. हे सोमरस के पात्र अंगिरा गोत्रीय ऋषियो एवं पितरो! तुम ऐसा प्रयत्न करो कि मुझ से द्रोह करने वाले शत्रु मृत्यु को प्राप्त हों. (५)
Give it to earth! You be compatible with me in conquering the enemy. Oh my god! You get ready to catch my enemy. O saints and fathers of Angira Gotriya, the characters of Somras! Try that the enemies who betray me will die. (5)