अथर्ववेद (कांड 2)
चन्द्र॒ यत्ते॒ तप॒स्तेन॒ तं प्रति॑ तप॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (१)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दूसरों को संतप्त करने की शक्ति है, उस से उन्हें संतप्त करो जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (१)
O Chandra Dev! Anger those who hate us or those we hate with the power you have to anger others. (1)