अथर्ववेद (कांड 2)
चन्द्र॒ यत्ते॒ ऽर्चिस्तेन॒ तं प्रत्य॑र्च॒ यो॑३ ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ (३)
हे चंद्र देव! तुम्हारी जो दीप्ति है, उस से उन लोगों को दीप्तिहीन बनाओ, जो हम से द्वेष करते हैं अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं. (३)
O Chandra Dev! Make those who hate us or those whom we hate deeply despise with the brightness of yours. (3)