अथर्ववेद (कांड 2)
शेर॑भक॒ शेर॑भ॒ पुन॑र्वो यन्तु या॒तवः॒ पुन॑र्हे॒तिः कि॑मीदिनः । यस्य॒ स्थ तम॑त्त॒ यो वः॒ प्राहै॒त्तम॑त्त॒ स्वा मां॒सान्य॑त्त ॥ (१)
हे राक्षसों के गांव के मुखिया और राक्षसों के स्वामी! तुम ने हमारी ओर जो दरिद्रता प्रदान करने वाली राक्षसी भेजी है तथा जो राक्षस भेजे हैं, वे हमारी ओर से लौट जाएं. तुम्हारे जो आयुध हैं, वे भी लौट जाएं. तुम्हारे अनुचर चोर भी लौट जाएं. तुम हमारे जिस शत्रु के हो, उसी के पास चले जाओ तथा उसे खा डालो. जिस प्रयोग करने वाले ने तुम्हें मेरे पास भेजा है. तुम उसी को खाओ. तुम उसी का मांस भक्षण करो. (१)
O head of the village of demons and swami of demons! May the demons that you have sent to us and the demons that you have sent return from us. Let the weapons you have also return. Your retainer thieves also return. Go to the enemy you belong to and eat it. The user who sent you to me. You eat the same. You eat his meat. (1)