अथर्ववेद (कांड 2)
शं नो॑ दे॒वी पृ॑श्निप॒र्ण्यशं॒ निरृ॑त्या अकः । उ॒ग्रा हि क॑ण्व॒जम्भ॑नी॒ ताम॑भक्षि॒ सह॑स्वतीम् ॥ (१)
चमकती हुई पृश्निपर्णी नाम की जड़ीबूटी हमें सुख प्रदान करे तथा रोग उत्पन्न करने वाली पाप देवता निर्त्ऋति को दुःख दे. मैं ने अत्यधिक शक्तिशाली, पापनाशिनी एवं रोग को पराजित करने वाली जड़ी पृश्निपर्णी को खाया है. (१)
May the shining herb named Prishniparni give us happiness and give sorrow to the sin god Nirtiti, who causes disease. I have eaten the very powerful, papanashini and disease-defeating herb Prishniparni. (1)