अथर्ववेद (कांड 2)
अङ्गेअ॑ङ्गे॒ लोम्नि॑लोम्नि॒ यस्ते॒ पर्व॑णिपर्वणि । यक्ष्मं॑ त्वच॒स्यं॑ ते व॒यं क॒श्यप॑स्य वीब॒र्हेण॒ विष्व॑ञ्चं॒ वि वृ॑हामसि ॥ (७)
हे यक्ष्मा रोगी पुरुष! तेरे अंगअंग में, रोमरोम में तथा जोड़जोड़ में जो यक्ष्मा रोग है, उसे मैं कश्यप महर्षि के मंत्रों के सूक्त के द्वारा बाहर निकालता हूं. (७)
O man with tuberculosis! I take out the tuberculosis disease in your angang, romrom and joint joint, through the sukta of kashyap maharishi's mantras. (7)