हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 101
अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ॥ (१)
मैं सब के ज्ञाता, होता और यज्ञों को उत्तम बनाने वाले अग्नि का वरण करता हूं. (१)
I am the knower of all and choose the agni that makes the yajnas better. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 101
अ॒ग्निम॑ग्निं॒ हवी॑मभिः॒ सदा॑ हवन्त वि॒श्पति॑म् । ह॑व्य॒वाहं॑ पुरुप्रि॒यम् ॥ (२)
हव्यवाहक, बहुतों के प्रिय तथा प्रजापति अग्नि को यजमान हवि प्रदान करते हैं. इस कारण हम भी अग्नि को हवि देते हैं. (२)
The havyavah, the beloved of many and Prajapati give the host to the agni. For this reason, we also give strength to agni. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 101
अग्ने॑ दे॒वाँ इ॒हा व॑ह जज्ञा॒नो वृ॒क्तब॑र्हिषे । असि॒ होता॑ न॒ ईड्यः॑ ॥ (३)
हे अग्नि! ऋत्विज्‌ के हेतु प्रदीप्त होते हुए तुम हमारे होता हो, इसलिए तुम देवों को हमारे इस यज्ञ में ले कर आओ. (३)
O agni! You are ours while shining for the sake of Ritwij, so bring the gods to this yajna of ours. (3)