अथर्ववेद (कांड 20)
अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ॥ (१)
मैं सब के ज्ञाता, होता और यज्ञों को उत्तम बनाने वाले अग्नि का वरण करता हूं. (१)
I am the knower of all and choose the agni that makes the yajnas better. (1)