हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 104
इ॒मा उ॑ त्वा पुरूवसो॒ गिरो॑ वर्धन्तु॒ या मम॑ । पा॑व॒कव॑र्णाः॒ शुच॑यो विप॒श्चितो॒ऽभि स्तोमै॑रनूषत ॥ (१)
हे इंद्र! तुम अपरिमित ऐश्वर्य वाले हो. अग्नि के समान पवित्र हमारी वाणियां तुम्हारी वृद्धि करें. हे स्तोताओ! तुम इंद्र के लिए प्रशंसा मंत्रों का उच्चारण करो. (१)
O Indra! You are one of immense opulence. May our words as sacred as agni increase you. O stotao! You chant praise mantras for Indra. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 104
अ॒यं स॒हस्र॒मृषि॑भिः॒ सह॑स्कृतः समु॒द्र इ॑व पप्रथे । स॒त्यः सो अ॑स्य महि॒मा गृ॑णे॒ शवो॑ य॒ज्ञेषु॑ विप्र॒राज्ये॑ ॥ (२)
जल के द्वारा बढ़े हुए सागर के समान ये अग्नि ऋषियों द्वारा दी गई हवियों से हजार गुना बढ़ते हैं. मैं इन अग्नि की महिमा का यथार्थ रूप में बखान कर रहा हूं. इन अग्नि का बल यज्ञ में देखने योग्य होता है. (२)
Like the ocean enlarged by water, these agnis grow a thousand times more than the desires given by the sages. I am truly proclaiming the glory of these agnis. The force of these agnis is worth seeing in the yajna. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 104
आ नो॒ विश्वा॑सु॒ हव्य॒ इन्द्रः॑ स॒मत्सु॑ भूषतु । उप॒ ब्रह्मा॑णि॒ सव॑नानि वृत्र॒हा प॑रम॒ज्या ऋची॑षमः ॥ (३)
हे इंद्र! तुम हवि प्राप्त करने योग्य हो. तुम हमें सभी यज्ञों में सुशोभित करो. वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र ऋचाओं के अनुसार अपना रूप प्रकट करते हैं. वे इंद्र हमारे सूक्तों, हवियों तथा मंत्रों को सुशोभित बनाएं. (३)
O Indra! You are achievable. May you adorn us in all the sacrifices. Indra, who kills the vritra demon, reveals his form according to the richas. May that Indra adorn our suktas, havis and mantras. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 104
त्वं दा॒ता प्र॑थ॒मो राध॑साम॒स्यसि॑ स॒त्य ई॑शान॒कृत् । तु॑विद्यु॒म्नस्य॒ युज्या॑ वृणीमहे पु॒त्रस्य॒ शव॑सो म॒हः ॥ (४)
हे धनों को देने वाले अग्नि! तुम सब को प्रभुता प्रदान करते हो. तुम जलों के पुत्र हो. हम प्रदीप्त अग्नि का वरण करते हैं. (४)
O agni that gives riches! You give sovereignty to everyone. You are the son of waters. We choose the illuminated agni. (4)