अथर्ववेद (कांड 20)
तव॒ द्यौरि॑न्द्र॒ पौंस्यं॑ पृथि॒वी व॑र्धति॒ श्रवः॑ । त्वामापः॒ पर्व॑तासश्च हिन्विरे ॥ (२)
हे इंद्र! आकाश तुम्हारा वीर्य है तथा जल और पर्वत तुम्हें प्रेरणा देते हैं. पृथ्वी तुम्हारे द्वारा ही अन्न की वृद्धि करती है. (२)
O Indra! The sky is your semen and water and mountains inspire you. The earth grows food through you. (2)