हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.109.3

कांड 20 → सूक्त 109 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 109
ता अ॑स्य॒ नम॑सा॒ सहः॑ सप॒र्यन्ति॒ प्रचे॑तसः । व्र॒तान्य॑स्य सश्चिरे पु॒रूणि॑ पू॒र्वचि॑त्तये॒ वस्वी॒रनु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥ (३)
वाणियां हवि के द्वारा इंद्र का पूजन करती हैं तथा यजमान के महान व्रत इंद्र से मिलते हैं. हे यजमान! इन रात्रियों के बाद तू अपने राज्य पर प्रतिष्ठित होगा. (३)
The vanis worship Indra through Havi and meet the great fast of the host Indra. O host! After these nights you will be established over your kingdom. (3)