हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.11.11

कांड 20 → सूक्त 11 → मंत्र 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
शु॒नं हु॑वेम म॒घवा॑न॒मिन्द्र॑म॒स्मिन्भरे॒ नृत॑मं॒ वाज॑सातौ । शृ॒ण्वन्त॑मु॒ग्रमू॒तये॑ स॒मत्सु॒ घ्नन्तं॑ वृ॒त्राणि॑ सं॒जितं॒ धना॑नाम् ॥ (११)
हम धन और ऐश्वर्य वाले तथा सुखदाता इंद्र को इस संग्राम में बुलाते हैं. जिस युद्ध से अन्न प्राप्त होता है, हम उस में अपनी रक्षा के लिए इंद्र का आह्वान करते हैं. शत्रुओं का नाश करने वाले और धनों के विजेता इंद्र का हम आह्वान करते हैं. (११)
We call Indra, the man of wealth and opulence and the pleasant, in this struggle. In the war from which food is obtained, we call on Indra to protect ourselves. We call upon Indra, the destroyer of enemies and the conqueror of wealth. (11)