हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.11.8

कांड 20 → सूक्त 11 → मंत्र 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
स॑त्रा॒साहं॒ वरे॑ण्यं सहो॒दां स॑स॒वांसं॒ स्वर॒पश्च॑ दे॒वीः । स॒सान॒ यः पृ॑थि॒वीं द्यामु॒तेमामिन्द्रं॑ मद॒न्त्यनु॒ धीर॑णासः ॥ (८)
बल प्रदान करने वाले, शत्रु सेना को पराजित करने वाले एवं स्वर्गीय जलों के सेवनकर्ता इंद्र ने मनुष्यों को धरती तथा आकाश दिए हैं. उन इंद्र की स्तुति करने वाले और यज्ञ कर्ता यजमान हवि दे कर उन्हें प्रसन्न करते हैं. (८)
Indra, who provides strength, defeats the enemy army and consumes heavenly waters, has given earth and sky to humans. Those who praise Indra and perform the yajna please him by giving him a blessing. (8)